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National and International Days

1st May : International Labour Day (अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस)

1st May : International Labour Day (अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस)

विश्व मजदूर दिवस की शुरुआत 1 मई 1886 से मानी जाती है। जब अमेरिका की मजदूर यूनियनों ने काम का समय 8 घंटे से ज़्यादा ना रखने के लिए हड़ताल की थी। विश्व मजदूर दिवस को इंटरनेशनल लेबर डे और श्रमिक दिवस के नाम से भी जाना जाता है। मजदूर हमारे समाज में बहुत महत्त्व रखते है। आज के आधुनिक मशीनरी के युग में भी उनका महत्त्व कम नहीं हुआ है।
एक  मकान को खड़ा करने और सहारा देने के लिए जिस तरह “मजबूत नींव” की भूमिका होती है, ठीक वैसे ही किसी समाज, देश, उद्योग, संस्था व्यवसाय को खड़ा करने के लिए कामगारों की विशेष भूमिका होती है। यह भी सच है कि मजदूर हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था और औद्योगिक प्रगति की प्रेरणा शक्ति है। श्रमिक कारखाने चलने, सड़कों का निर्माण करने, इमारतें बनाने, तेल निकालने आदि अलग-अलग तरीकों से काफी मदद करते हैं।
Labour Day
महात्मा गाँधी ने कहा था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है। प्रबंध चलाने के लिए मजदूरों, कामगारों और किसानों की बेहतरी, भलाई और विकास, अमन और कानूनी व्यवस्था बनाये रखने के लिए वचनबद्ध होते है। मजदूरों और किसानों की बड़ी संख्या का प्रबंध में बड़ा योगदान है।
भारतीय संदर्भ में गुरु नानक देव जी ने किसानों, कामगारों और मजदूरों के हक में आवाज़ उठायी थी और उस समय के अहंकारी और लुटेरे हाकिम ऊँट पालक भागों की रोटी न खाकर उसका अहंकार तोड़ा और भाई लालो की काम की कमाई को सत्कार दिया था। गुरू नानक देव जी ने “काम करना, नाम जपना, बाँट छकना और दसवंध निकालना” का संदेश दिया। गरीब मजदूर और कामगार का विनम्रता का राज स्थापित करने के लिए मनमुख से गुरमुख तक की यात्रा करने का संदेश दिया। 1 मई को भाई लालो दिवस के तौर पर भी सिक्ख समुदाय में मनाया जाता है।
मजदूर हमारे समाज का वह तबका है जिस पर समस्त आर्थिक उन्नति टिकी होती है। यह मानवीय श्रम का सबसे आदर्श उदाहरण है। मजदूर अपना श्रम बेचता है, बदले में वह न्यूनतम मजदूरी प्राप्त करता है। उसका जीवन-यापन दैनिक मजदूरी के आधार पर होता है। जब तक वह काम कर पाने में सक्षम होता है तब तक उसका गुज़ारा होता है। जिस दिन वह तक कर काम छोड़ देता है, वह दूसरों पर निर्भर हो जाता है। भारत में कम से कम असंघठित क्षेत्र के मजदूरों की तो यही स्थिति है। संघठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति तो फिर भी अच्छी है। उन्हें  मासिक वेतन, महंगाई भत्ता, पेंशन व अन्य सुविधाएं प्राप्त है। कार्य के दौरान मृत्यु होने पर उन्हें विभाग की ओर से सुरक्षा प्रदान की जाती है।
मजदूर चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, आर्थिक क्रियाकलापों में उसकी अग्रणी भूमिका होती है। वह सड़कों एवं पुलों के निर्माण में सहयोग करता है। वह ईंटे बनाता है, वह खेतों में किसानों की मदद करता है। सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, हथकरघा उद्योग, लोहा एवं इस्पात उद्योग, सीमेंट उद्योग आदि जितने भी प्रकार के उद्योग हैं, उनमें मजदूरों की भागीदारी अपरिहार्य होती है। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मजदूरों के साथ जाति, धर्म, पंथ, लिंग, विकलांगता के आधार पर भेदभाव न किया जाये।
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