World Puppetry Day
National and International Days

21st March : World Puppetry Day (विश्व कठपुतली दिवस)

21st March : World Puppetry Day (विश्व कठपुतली दिवस)

विश्व कठपुतली दिवस विश्व भर में 21 मार्च को मनाया जाता है। कठपुतली का इतिहास बहुत पुराना है। कुछ लोग कठपुतली के जन्म को ईश्वर की देन मानते है उनका कहना है कि शिव जी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहला कर इस कला की शुरुआत की थी। भारत  में इस तरह से इस कला का उल्लेख है। आज यह कला श्रीलंका, चीन, अमेरिका, इंग्लैंड, जापान आदि अनेक देशों में पहुंच चुकी है। इन देशों में इस विद्या का सामयिक प्रयोग कर इसे बहुआयामी रूप प्रदान किया गया है। वहां कठपुतली जैसी कला को मनोरंजन के अलावा शिक्षा, विज्ञापन आदि  जैसे क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया जाता है।
दुनिया भर में कठपुतली दिवस पर अनेक प्रकार के कार्यक्रम के आयोजन किये जाते है। इस दिवस की शुरुआत 21 मार्च 2003 को फ्रांस में की गयी। तब से यह दिवस भारत सहित अन्य सभी देशों में भी धूम-धाम से मनाया जाने लगा।
इसको मनाने का उद्देश्य प्राचीन लोक कला को जन-जन तक पहुंचाना तथा आने वाली पीढ़ी को इससे अवगत करवाना है। क्योंकि ये कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि लोगों को जागरूक करने का एक माध्यम भी है।
World Puppetry Day
कठपुतली नाटक एक प्राचीन लोक कला है। इसमें लकड़ी के पुतले होते है जो एक डोर से बंधे होते है। जिसकी डोर संचालक के हाथ में होती है जो उसका निर्देशन कर अपनी कला को प्रदर्शित करता है। इसी निर्देशक और हाव- भाव से बड़े से बड़ा नाटक किया जा सकता है। इसको प्रस्तुत करना बड़ा ही कठिन होता है। लेकिन देखने वाले के लिए बहुत ही रोचक होता है। संचालक का ध्यान इधर-उधर होने से सारा खेल भी बिगड़  सकता है। इसलिए संचालक को बहुत ध्यान से और पूरी एकाग्रता के साथ प्रदर्शन करना होता है।
आधुनिक जीवन शैली से हम टीवी, फ़ोन, फेसबुक, व्हट्सप्प, ट्विटर आदि में इतना खो चुके है कि हम अपने जीवन के मनोरंजन के साधन को भूलते जा रहे है। अब तो बस एक क्लिक पर सारी दुनिया की खबरें पता चल जाती है, परन्तु इसके चलते हम अपनी परम्पराओं को भूलते जा रहे है। जिनमें से एक है – “कठपुतली नृत्य।” यह केवल नृत्य नहीं है बल्कि जब नुक्कड़ नाटक का प्रचलन नहीं हुआ था तब इसी के माध्यम से हर छोटे-बड़े मुद्दे को लोगों तक पहुंचा कर जागरूकता लायी जाती थी।
ये नाटक अशिक्षित लोगों के बीच भी प्रचलित था। सभी लोग के उम्र इसका पूरा लुत्फ़ उठाते थे। लेकिन अफ़सोस आधुनिक काल में ये कला दिन प्रतिदिन लुप्त होती जा रही है। इसलिए इसको विश्व भर में 21 मार्च को मनाया जाता है ताकि प्राचीन परम्परा को बचाया जा सके।
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