Monetary Policy of the RBI
Blogs,  Education Blogs

Reserve Bank of India Monetary Policy Appraisal

भारतीय रिज़र्व बैंक की मुद्रा नीति का मूल्यांकन

Reserve Bank of India Monetary Policy Appraisal

 

विकसित देशों में मुद्रा नीतिक का उद्देश्य कीमत स्थिरता के साथ पूर्ण रोज़गार होता है। लेकिन विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में इसका उद्देश्य रोज़गार के ऊँचे स्तर व कीमत स्थिरता के साथ संवृद्धि को इष्टतम करना होता है। भारत जैसे देश में जहाँ हर समय संवृद्धि की दर को तेज़ करने का प्रयास किया जाता है, उद्योग, कृषि और व्यापार संबंधी साख की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए साख और मुद्रा पूर्ति  का निरंतर विस्तार करना पड़ता है। इसलिए भारतीय रिज़र्व बैंक साख को सीमित करने की नीति नहीं अपना सकता। इन स्तिथियों में रिज़र्व बैंक की केवल यह जिम्मेदारी है कि वह सट्टेबाज़ी के लिए साख की उपलब्धता को रोके। अतः भारतीय रिज़र्व बैंक का यह दावा सही है कि इसकी मुद्रा नीति एक नियंत्रित विस्तार की नीति है।

 

भारतीय रिज़र्व बैंक के पास साख नियंत्रण के व्यापक अधिकार है। ये अधिकार मात्रात्मक और चयनात्मक दोनों प्रकृति के है। इसके अंतर्गत हम इस बात पर विचार करेंगे कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने विकासात्मक नियोजन के 40 सालों में मौद्रिक नियंत्रण के इन उपकरणों का कितने तरीकों से प्रयोग किया है।

 

विकासात्मक नियोजन का युग 1951 में शुरू हुआ था। यह वह समय था जब दुनिया के ज़्यादा देशों में सस्ती मुद्रा नीति का पालन किया जा रहा था, जिसका अर्थ था की बैंक दर नीची रखी गयी थी। 1951 में कोरिया युद्ध से स्फीतिकारी दबाव पैदा हुए और भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपनी बैंक दर 3% से बढाकर 3.5% कर दी।

 

पहली पंचवर्षीय योजना

पहली पंचवर्षीय योजना के दौरान मुद्रा पूर्ति में वार्षिक वृद्धि केवल 3.4% थी, जो काफी कम थी। लेकिन उत्पादन में वृद्धि से व अर्थव्यवस्था के बढ़ते हुए मुद्रीकरण से उत्प्न्न मुद्रा की मांग को पूरा करने के लिए यह पर्याप्त नहीं थी। अतः थोक कीमतों में 2.7% प्रति वर्ष कमी हुई।

 

दूसरी पंचवर्षीय योजना

दूसरी पंचवर्षीय योजना की अवधि में स्थिति में बहुत परिवर्तन आया। औद्योगीकरण पर अधिक ज़ोर देने व अर्थव्यवस्था को तेज़ी से आगे बढ़ाने के प्रयत्नों से साख की मांग तेज़ी से बढ़ी। अतः 1956 से 1961 की अवधि में मुद्रा पूर्ती में वार्षिक वृद्धि 8:2 प्रतिशत थी। मुद्रा पूर्ती को संयत करने के लिए न केवल मई 1957 में बैंक दर को बढ़ाकर 4% कर दिया बल्कि चयनात्मक साख नियंत्रण का भी प्रयोग किया।

 

तीसरी पंचवर्षीय योजना

तीसरी योजना की अवधि में राष्ट्रीय आय में केवल 2.3% वार्षिक वृद्धि हुई लेकिन मुद्रा पूर्ति में प्रति वर्ष वृद्धि 9.1% हुई। इससे स्फीतिकारी स्थिति उत्पन्न हुई जिसे रिज़र्व बैंक ने बैंक दर बढ़ाकर रोकने का प्रयत्न किया। जनवरी, 1963 में बैंक दर 4.5% कर दी गयी, अक्टूबर, 1964 में 5% कर दी गयी और  मार्च, 1965 में इसे 6% कर दिया गया। 1960 से 1964 तक भारतीय रिज़र्व बैंक ने पुनर्वित्त प्रदान करने की कोटा पद्द्ति लागू की और 1964 में विभेदक ब्याज दरों की प्रणाली अपनायी। इन दोनों उपकरणों का उद्देश्य साख पर रोक लगाना था। सितम्बर, 1964 में सांविधिक तरलता अनुपात को 20% से बढ़ाकर 25% कर दिया गया। यदि उत्पादन की स्थिति संतोषजनक होती तो ये उपाय प्रभावी सिद्ध होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वस्तुओं की पूर्ति बढ़ने में असफल होने से साख नियंत्रण उपाय अपनाने के बावजूद मुद्रा की पूर्ति में विस्तार स्फीतिकारी सिद्ध हुआ। 1967-1968 में जब पूर्ति की स्थिति उत्पादन के क्षेत्र में प्रोत्साहक परिणामों के कारन सुधरी तब स्फीतिकारी दबाव कम हुए और बैंक दर को 6% से 5% घटाकर कर दिया गया।

 

चौथी पंचवर्षीय योजना

चौथी पंचवर्षीय योजना की अवधि में उत्पादन के क्षेत्र में असफलताओं और सुरक्षा व्यय व शरणार्थी सहायता पर व्यय में वृद्धि से स्फीतिकारी दबाव बढ़े। इस अवधि में मुद्रा की पूर्ति को तेज़ दर से नहीं बढ़ने देना चाहिए था। लेकिन मुद्रा पूर्ति में प्रति वर्ष वृद्धि 16.2% हुई, जिससे अवश्य ही स्फीतिकारी दबाव बढ़े। फिर भी, रिज़र्व बैंक ने मौद्रिक नियंत्रण के विभिन्न उपाय अपनाये। शुद्ध तरलता अनुपात अप्रैल, 1970 में 30% था, इसे जनवरी, 1971 में बढ़ाकर 34% कर दिया गया और 1973 में फिर बढ़ाकर 37% कर दिया गया। मई, 1973 में बैंक दर को 6% से बढ़ाकर 7% कर दिया गया। नकद कोष अनुपात को 3% से बढ़ाकर 5% किया गया और सितम्बर, 1973 में इसे और बढ़ाकर 7% कर दिया गया। लेकिन ये सभी उपाय स्फीतिकारी दबावों को रोकने में असफल हुए और 1973-1974 में थोक कीमतें बढ़ी।

 

पांचवी पंचवर्षीय योजना

पांचवी पंचवर्षीय योजना की अवधि में राष्ट्रीय आय तो 5.3% वार्षिक दर से बढ़ी लेकिन मुद्रा पूर्ति 17.9% से बढ़ी। इससे स्फीतिकारी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। अतः न केवल रिज़र्व बैंक ने बैंक दर को 7% से 9% कर दिया बल्कि सरकार ने भी राजकोषीय उपाय अपनाये। इन उपायों से कुछ हद तक स्फीतिकारी स्थिति सुधरी और इसने रिज़र्व बैंक को स्फीतिकारी स्थिति के बारे में कुछ हद तक आत्म संतुष्ट बना दिया। इसके परिणामस्वरूप मुद्रा नीति की मुद्रास्फीति पर पकड़ ढीली हो गयी। नकद कोष अनुपात को जून, 1974 में 7% से घटाकर 5% कर दिया गया और दिसम्बर, 1974 में 4% कर दिया गया। ये रियायतें अनावश्यक थी। 1979-80 में सूखा पड़ा। इस वर्ष राष्ट्रीय आय में  5-5% कमी होने पर भी मुद्रा पूर्ति को 17.3% बढ़ने दिया। इसके परिणामस्वरूप कीमतें 17.2% बढ़ी।

 

छठी पंचवर्षीय योजना

छठी योजना में मौद्रिक अधिकारीयों में आत्म संतुष्टि झलकी। इस अवधि में राष्ट्रीय आय में 5.3% प्रतिवर्ष वृद्धि होने पर भी कीमतें 9.3% की दर से बढ़ी। यह मुद्रा पूर्ति में 16.9% की वार्षिक वृद्धि के कारण हुआ। जुलाई, 1981 में बैंक दर को बढ़ाकर 10% करने तथा नकद कोष अनुपात और सांविधिक नकदी अनुपात को 1984 में क्रमशः 9% और 35% निश्चित करने का स्फीतिकारी स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

 

सातवीं पंचवर्षीय योजना

सातवीं योजना की अवधि में मुद्रा पूर्ति और राष्ट्रीय आय क्रमशः 17.6% और 5.4% दरों से बढ़ी। इसी अवधि में थोक कीमतें 7% वार्षिक दर से बढ़ी। यह दर्शाता है कि रिज़र्व बैंक ने मुद्रा पूर्ति के क्षेत्र में सावधानीपूर्वक कार्य नहीं किया। सातवीं योजना की अवधि में नकद कोष अनुपात कई बार बढ़ाया गया और अंत में जून 30, 1988 से 11% निश्चित किया गया। सांविधिक तरलता अनुपात भी कई बार बढ़ाया गया और अप्रैल, 1987 में इसे 38% निश्चित किया गया। ये तथा इनके साथ चयनात्मक साख नियंत्रण उपाय सामान्य कीमत स्तर में स्थिरता लाने में अप्रभावी सिद्ध हुए। 19901-1991 में स्फीतिकारी स्तिथि काबू से बाहर हो गयी क्योंकि थोक कीमतों में लगभग 12% वृद्धि हुई। इस अवधि में रिज़र्व बैंक ने कीमत वृद्धि को रोकने के लिए कोई खास उपाय नहीं किये। सितम्बर, 1990 में केवल सांविधिक तरलता अनुपात को बढ़ाकर 38.5% कर दिया।

 

अतः कहा जा सकता है कि भारतीय रिज़र्व बैंक की मुद्रा नीति कमज़ोर रही है। ऐसा लगता है कि हर समय मौद्रिक नियंत्रण के कठोर उपाय अपनाने में झिझक रही है। यह संभव है कि भारतीय रिज़र्व बैंक प्रभावी उपाय अपनाने की दुविधा का कारण यह रहा हो कि कठोर साख नियंत्रण उपायों के अपनाने से संवृद्धि दर में कमी होने का खतरा होता है।

0 Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *